दोस्तों India vs Pak 1971 के इस भाग दो म हम युद्ध की तैयारीयों के बारे में जानेंगे | चलिए शुरू करते है – जैसा हमने आपको पहले ही बताया था कि भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी उस समय देश में व्याप्त गरीबी को हटाने में ध्यान लगाए हुई थी | किन्तु बांग्लादेशी नागरिकों के असंवैधानिक तरीके से देश में घुसने से भारत भी इस परेशानी का हिस्सा बन चुका था | ऐसे में युद्ध करने के अलावा दूसरा कोई भी रास्ता प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के सामने नहीं बचा था |
लेकिन यह भी बात थी कि भारत इस तरह से किसी दूसरे देश के मामले में अपनी टांग नहीं अड़ा सकता था | ऊपर से अमेरिका और ब्रिटेन जैसे बड़े-बड़े देशों का पाकिस्तान के पास खुला समर्थन था | ऐसे में भारत जिसके पास उस समय किसी भी बड़े देश का समर्थन नहीं था, वह कैसे इस युद्ध में उतर सकता था ? मगर युद्ध से ठीक पहले भारत और तत्कालीन सोवियत संघ ने ट्रीट योर फ्रेंडशिप एंड कोऑपरेशन अर्थात अपनी मित्रता और सहयोग का व्यवहार करें के समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके थे |
जबकि उस समय सोवियत संघ ने उस समय के युद्ध में सहयोग करने के लिए इस समझौते में इस बात की गारंटी नहीं दी थी कि वह इस युद्ध में भारत का खुला समर्थन करेगा | लेकिन अब यूनाइटेड नेशंस के अंदर भारत को एक बड़ा सहयोगी मिल चुका था | दरअसल यूनाइटेड नेशन सिक्योरिटी काउंसिल में पांच परमानेंट सदस्य होते हैं | इन पाँचों सदस्यों के पास वीटो पावर होती है | इस विशेष पावर के चलते काउंसिल के यह पांच सदस्य किसी भी संकल्प को रोक सकते हैं | ये पांच देश अमेरिका, ब्रिटेन, रूस, चीन और फ्रांस हैं |
भारत को रूस का समर्थन मिलने के बाद यह बात साफ हो गई थी कि अगर भविष्य में पाकिस्तान का समर्थन अमेरिका ब्रिटेन और चीन करेंगे, तो रूस उस प्रस्ताव को वीटो कर देगा | इस तरीके से यूनाइटेड नेशन भारत को कुछ खास नुकसान नहीं पहुंच पाएगा | लेकिन उसे समय युद्ध के लिए केवल यही एक दिक्कत नहीं थी, क्योंकि तब सिर्फ 9 साल पहले ही भारत की चीन से करारी हार हुई थी |
भारतीय सेना भी उस सदमे से उठ नहीं पाई थी | वहीं भारत और चीन का साल 1962 में हुआ युद्ध, भारत के नेताओ के नेत्रित्व में बड़ी कमियों को भी सामने लेकर आया था | इसके साथ ही भारत की विदेश नीति के बारे में भी कई सारे सवाल उठाए गए थे | उसके बाद साल 1965 में पाकिस्तान ने भारत से युद्ध की थी | हालांकि इस युद्ध में भारत की जीत हुई, लेकिन तभी से भारत की इकोनॉमी यानी अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ा था |
फिलहाल अब भारत एक और युद्ध के करीब जा रहा था | ऐसे में देश को आर्थिक तौर पर भी तैयार रहना था | उधर बांग्लादेश में पाकिस्तान की सेना लगातार आम नागरिकों का कत्ल कर रही थी | इन आम नागरिकों में ज्यादातर हिंदू नागरिक थे | वहीं भारत में उनके लिए असम मणिपुर और पश्चिम बंगाल के सीमांत इलाकों पर शरणार्थी शिविर भी लगाए गए थे |
जहां पर लाखों की संख्या में शरणार्थी रह रहे थे | देश में इतने ज्यादा शरणार्थीयों के आने से भारत के ऊपर और ज्यादा आर्थिक दबाव बन रहा था | 27 मार्च सन 1971 को इंदिरा गांधी ने आधिकारिक तौर पर बांग्लादेश को आजाद करने की मांग का समर्थन करके, एक बड़ी घोषणा कर दी थी | उस समय इंदिरा गांधी युद्ध करने की ठान चुकी थी | उन्हें बस इंतजार था, तो सही समय का | जैसा कि हमने आपको पहले बताया था कि कैसे सेनाध्यक्ष मानेक शॉ ने मौसम संबंधी चीजों को देखते हुए इंदिरा गांधी से कहा था कि उन्हें युद्ध दिसंबर के महीने तक शुरू नहीं करनी चाहिए |
कई सारे लोगों का यह भी मानना है कि जब शुरुआत में इंदिरा गांधी ने मानेक शॉ पर ज्यादा जोर अजमाने की कोशिश की तो उन्होंने इंदिरा गांधी के सामने अपना इस्तीफा पेश कर दिया था | वही इस युद्ध में हिस्सा लेने की उन्होंने एक ही शर्त रखी और वह यह था कि उन्हे यह युद्ध उनके हिसाब से लड़ने दी जाए |
आखिरकार इंदिरा गांधी ने मानेक शॉ को युद्ध को उनके हिसाब से लड़ने के लिए अनुमति दिया | अनुमति मिलते ही मानेक शॉ ने सेना को आदेश दिया कि वह भारत के शरणार्थी शिविर में रह रहे पूर्वी पाकिस्तान के नागरिकों को ट्रेनिंग देना शुरू करें | मुक्ति वाहिनी के बहुत बड़ी संख्या में सैनिकों को भारत के द्वारा ही ट्रेनिंग दी गई थी | सिर्फ इतना ही नहीं युद्ध में आधिकारिक तौर पर हिस्सा लेने से पहले भारत की ओर से इंटरनेशनल कम्युनिटी को भी बहुत बार गुहार लगाई गई थी कि वे बांग्लादेश में चल रहे नरसंहार पर कुछ कार्यवाही करें |
लेकिन उस समय किसी ने भी इस बात पर ध्यान नहीं दिया | इसी के चलते भारत को आखिरकार इस युद्ध में हिस्सा लेना पड़ा | उधर पाकिस्तान में सितंबर साल 1971 के अंत तक एक खास प्रोपेगेंडा चल रहा था | इस प्रोपेगेंडा के तहत पाकिस्तान की बड़ी-बड़ी पॉलीटिकल पार्टी क्रश इंडिया नाम पर कैम्पेन चला रही थी | इस कैम्पेन में ये पार्टियों पाकिस्तान सेना पर भारत के खिलाफ युद्ध शुरू करने के लिए दबाव बना रही थी |
वहीं जब पाकिस्तान की पॉलीटिकल पार्टी ने यह देखा कि पाकिस्तान की बड़ी जनसंख्या भारत पर हमले का समर्थन कर रही है, तो उन्होंने भी युद्ध शुरू करने के लिए तैयारियां शुरू कर दी थी | यह भी एक सच था कि पाकिस्तान के मन में भारत में रहने वाले लोगों के प्रति काफी ज्यादा नफरत भरा था | वहां अक्सर यह कहा जाता था कि भारत में रहने वाले हिंदू गंदे और कमजोर होते हैं | वे अभी हमसे जीत नहीं सकते हैं | इस प्रोपेगेंडा ने भी पाकिस्तान को भारतीयों के खिलाफ युद्ध छोड़ने के लिए उकसाया | जिसका खामियाजा उसे अपने देश के टुकड़े करने के साथ चुकाना पड़ा था |